बाल सुधार गृह के स्याह सच से लिखा जाएगा भारत का भविष्य???

इस गृह में रहने वाले बच्चों को कई सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी शायद इसी उद्देश्य के साथ इसकी स्थापना की गई थी लेकिन पिछले कुछ दिनों की रिपोर्ट देखें तो बाल सुधार गृह यातना गृह बन कर रह गए हैं

बाल सुधार गृह मतलब कम उम्र में अपराध करनेवाले किशोरों को बाल सुधार गृह में न्यायालय के आदेश पर सुरक्षित रखा जाएगा। यहीं से जरूरत पड़ने पर बच्चों को कोर्ट ले जाया जाएगा। इस गृह में रहने वाले बच्चों को कई सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी शायद इसी उद्देश्य के साथ इसकी स्थापना की गई थी लेकिन पिछले कुछ दिनों की रिपोर्ट देखें तो बाल सुधार गृह यातना गृह बन कर रह गए हैं….. ताजा मामला बिहार की राजधानी पटना के पटना सिटी गाय घाट स्थित महिला सुधार गृह (उत्तर रक्षा गृह) से जुड़ा हुआ है, जहां से बाहर आई महिला ने सुधार की अधीक्षिका पर गंभीर आरोप लगाए थे महिला रिमांड होम से बाहर आने पर सीधे महिला थाने में पहुंची, जहां उसने कई राज खोले. महिला ने बताया कि गाय घाट स्थित उत्तर रक्षा गृह की अधीक्षिका वंदना गुप्ता द्वारा संवासिनों को नशे की सुई देकर अवैध कारोबार करने पर मजबूर किया जाता है. मामला 31.1.2022 का है
जहां अधीक्षिका लड़कियों को भेजती थीं बाहर| महिला की मानें तो इसका विरोध करने वाली संवासिनों के साथ मारपीट की जाती थी और उन्हें भूखा भी रखा जाता था. संवासिन का यह भी आरोप है कि उत्तर रक्षा गृह में महिलाओं को इस कदर मजबूर कर दिया जाता है कि वे आत्महत्या करने को विवश हो जाती हैं. उसने कहा कि सुंदर लड़कियां मैडम की फेवरेट हैं. वे उन्हें खूब मानती हैं. जांच के बहाने उन्हें रिमांड से बाहर भेजा जाता है. लेकिन वैसी लड़कियां जो उनकी बात नहीं मानती वे उन्हें पहले तो परेशान करती हैं. फिर उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ बता कर पागल खाने भेज दिया जाता है. एसडीओ ने जांच की लेकिन क्या हालात सुधरे ??? बिल्कुल नहीं सब कुछ “ढाक के तीन पात” आज भी हालात वैसे ही हैं…. भले ही उस वक्त महिला के इन आरोपों के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया था. लेकिन काफी लंबे समय तक महिला थाने में अभी तक इस बाबत मामला दर्ज नहीं किया गया . इस संबंध में पटना सिटी के एसडीओ का कहना था कि मामले की उच्च स्तरीय जांच हो रही है. दोषी पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई होगी. इधर, शिकायत करने के बाद महिला उत्तर रक्षा गृह वापस जाने को तैयार नहीं थी. उसका कहना था कि अगर वो वापस गई तो उसे मार दिया जाएगा. क्या किसी की जान इतनी सस्ती हो सकती है? ज़रा सोचिए जहां लड़कियों को सुधार के लिए भेजा जाता है वहां अगर उनके साथ ऐसा होता है जिससे उनका वजूद ही खतरे में पड़ जाए तो फिर सुधार किस बात का?
औरंगाबाद के बभंडी में भी बाल सुधार गृह बनकर तैयार हो गया है। इसका उद्घाटन 17 मार्च को जिला एवं सत्र न्यायाधीश शिवगोपाल मिश्रा, डीएम सौरभ जोरवाल एवं एसपी सुधीर कुमार पोरिका के हाथों किया गया। अब तक यहां के वैसे किशोर जो अपराध में पकड़ जाते थे, उन्हेंए गया भेजा जाता था। लेकिन अब वे यहीं रखे जा सकेंगे।कहा जा रहा है कि समाज कल्याधण विभाग इसका संचालन करेगा जिला बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक संतोष कुमार चौधरी ने बताया कि बाल सुधार गृह को समाज कल्याण विभाग ने बनवाया है। इसे इसी विभाग के कार्यालय की ओर से संचालित किया जाएगा। कम उम्र में अपराध करनेवाले किशोरों को बाल सुधार गृह में न्यायालय के आदेश पर सुरक्षित रखा जाएगा। यहीं से जरूरत पड़ने पर बच्चों को कोर्ट ले जाया जाएगा। इस गृह में रहने वाले बच्चों को कई सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी। लेकिन क्या ये सुविधाएं यहां रहने वाले बच्चों को मिल पाएंगी? क्या जो योजना यहां रहने वाले बच्चों के लिए बनाई गई हैं वो जमीनी स्तर पर लउतर पाएंगे? क्योकि जब राजधानी पटना के बाल सुधार गृह की हालत बदत्तर है तो फिर बिहार के अन्य राज्यों की बेहतरी की कल्पना कैसे की जा सकती हैं ???……
आपको 2 जून 2018 का मामला तो याद ही होगा मुजफ्फरपुर में सरकार द्वारा संचालित बालिका गृह में रहने वाली बालिकाओं के यौन शोषण का खुलासा हुआ था। मुंबई की प्रतिष्ठित संस्था ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ से जारी सोशल ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार यहां रहने वाली लड़कियां नेता से लेकर अधिकारी तक के घरों में भेजी जाती थी। इस खुलासे के बाद जिला प्रशासन की नींद उड़ गई थी। बालिका गृह का संचालन करने वाली संस्था के लोग फरार हो गए। जिला प्रशासन ने आनन-फानन में वहां रहने वाली लड़कियों को पटना और मधुबनी स्थानांतरित कर दिया है और बालिका सुधार गृह को सील कर दिया था
वैसा ही मामला 31.7.2018 में फिर सामने आया जब बिहार सरकार के फंड से मुज़फ़्फ़रपुर में चल रहे बालिका गृह में रहने वाली 42 बच्चियों में से 34 बच्चियों से रेप और यौन शोषण की पुष्टि हो चुकी थी. लड़कियों की आपबीती ने सबके रोंगटे खड़े कर दिए थे.. एफआईआर के आधार पर इस मामले में अब तक एनजीओ के मुखिया ब्रजेश ठाकुर, बालिका गृह में काम करने वाली किरण कुमारी, मंजू देवी, इंदू कुमारी, मीनू देवी, चंदा कुमारी, हेमा मसीह के साथ ही डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर रवि कुमार रोशन और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य विकास की गिरफ्तारी हो चुकी है.
इस पूरे मामले में राज्य के समाज कल्याण विभाग की मंत्री कुमारी मंजू वर्मा के पति का नाम भी सामने आ रहा है. मंत्री ने इस संबंध में कहा कि अगर उनके पति दोषी पाये जाते हैं, तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगी.इस बीच, राज्य सरकार की अपील पर सीबीआई ने आधिकारिक तौर पर मामला अपने हाथ में ले लिया और नए सिरे से जांच शुरू की.
इस पूरे मामले का आरोपी ब्रजेश ठाकुर थे और जिस तरह के नियमों की अनदेखी करके बालिका गृह का संचालन बिना रोकटोक चल रहा था और सरकारी फंड भी मिल रहा था, उससे पता चलता है कि उसकी पैठ सियासी गलियारों से लेकर ब्यूरोक्रेसी के कॉरिडोर तक सामने आई. उनकी मदद से वह हर चीज को मैनेज कहोता था दिलचस्प बात तो यह है कि टिस की रिपोर्ट के बाद उसके एनजीओ को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था, इसके बावजूद उसे भिखारियों के लिए आवास बनाने केनाम पर हर महीने 1 लाख रुपये का प्रोजेक्ट दिया गया था.ब्रजेश ठाकुर के रसूख का अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि 2013 में ही उसके एनजीओ को लेकर समाज कल्याण विभाग को नकारात्मक रिपोर्ट भेजी गई थी, इसके बावजूद एनजीओ को हर साल फंड मिलता रहा. इंडियन एक्सप्रेस ने एक जिला स्तरीय अधिकारी के हवाले से लिखा है कि पटना दफ्तर में एनजीओ को लेकर नकारात्मक रिपोर्ट दी गई थी क्योंकि बालिका गृह सघन आबादी वाले इलाके में स्थित था और उसकी सीढ़ियां भी बेहद संकरी थी. इसके साथ ही प्रातः कमल अखबार का दफ्तर भी उसी प्रांगण में, जो कि नहीं होना चाहिए, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों ने जुबान बंद रखने को कहा.फिर क्या होगा इन बाल सुधार गृहों का सोचने वाली बात है?
क्या है बाल गृहों में रहने वाले बच्चों का भविष्य?
बाल गृहों में रहने वाले बच्चों से जुड़ा एक सर्वे सामने आया है। जिसके अनुसार यहां से निकलने वाले युवाओं में से महज़ 52 प्रतिशत ही अपने पैरों पर खड़े हो पाते हैं, आत्म निर्भर बन पाते हैं। बाक़ी 48 प्रतिशत का भविष्य अंधकार में खो जाता है।अक्सर इन बाल गृहों में बच्चों को उपलब्ध सुविधाएं और उनके साथ हो रहे व्यवहार पर सवाल उठते रहे हैं। कई घटनाएं भी सुर्खियां बनी हैं, लेकिन फिर भी हालात नहीं बदले। इन संस्थानों से निकले बच्चे इसे जेल का नाम देते हैं। शायद ये शब्द उनकी मुश्किलों को बयां करने के लिए काफ़ी हैं। बच्चें यहां अपने क़दमों को सही ठहराने के लिए नए-नए बहाने तलाश करने की कोशिश में लगे होते हैं। लेकिन बाल देखभाल गृहों में बच्चों को देखभाल के नाम पर सिर्फ़ छलावा ही मिलता है। मारे देश में एक बड़ी संख्या उन बच्चों की है जो या तो अनाथ हैं, उनके माता-पिता जीवित नहीं हैं और उनका कोई अभिभावक नहीं है या फिर ऐसे बच्चे हैं जो किसी न किसी कारणवश घर से भागे हुए हैं या फिर किसी जुर्म के चलते अपने घर से दूर सज़ा काटने को मजबूर हैं।
ऐसे बच्चों के लिए सरकार और कुछ स्वैछिक संस्थाओं ने बाल देखभाल संस्थान या बाल सुधार गृह बनाए हुए हैं। जहां इन बच्चों को मूल ज़रूरतें यानी रोटी, कपड़ा, रहने के लिए छत के साथ-साथ शिक्षा भी 18 साल तक की उम्र तक दीं जाती है। हाल ही में बाल गृहों में रहने वाले इन बच्चों से जुड़ा एक सर्वे सामने आया है। जिसके अनुसार यहां से निकलने वाले युवाओं में से महज़ 52 प्रतिशत ही अपने पैरों पर खड़े हो पाते हैं, आत्म निर्भर बन पाते हैं। बाक़ी 48 प्रतिशत का भविष्य अंधकार में खो जाता है। जिन्हें नौकरी मिलती है वो भी मुश्किल से 7,500 से 8,500 तक ही कमा पाते हैं।
सर्वे में कुछ और हैरान करने वाली बातें भी सामने आई हैं। यहां भी लड़कियां अपने रास्ते खोजने में नाकाम रही हैं। सर्वे के अनुसार कक्षा 12 वीं तक की पढ़ाई पूरा करने वाली लड़कियों के लिए काम के कम अवसर हैं। 63 प्रतिशत लड़कियों के हाथ नौकरियों से ख़ाली रह जाते हैं, उन्हें अपनी ज़रूरतों के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाना पड़ते हैं। ये सर्वे यूनिसेफ़, टाटा ट्रस्ट और उद्यान केयर के सहयोग से 5 राज्यों – दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और महाराष्ट्र में 435 लोगों पर किया गया। जिसमें इन बाल गृहों को लेकर कई खुलासे हुए हैं।इस विश्लेषण में ये बात भी सामने आई है इन बाल गृहों में रहने वाले बच्चों में एक बड़ी तादाद उन बच्चों की भी है जो अपनी स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते। ये संख्या कुल बच्चों की संख्या का लगभग 40 प्रतिशत है। ऐसे में आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन बच्चों का क्या ही भविष्य होगा?

बच्चों की सही परवरिश के लिए बहुत ज़रूरी है कि उनके आस-पास का माहौल ख़ुशनुमा और लोग साकारात्मक हों। लेकिन इन बाल गृहों की एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि यहां बच्चों के लगातार ठिकानों को बदला जाता है। सर्वे के मुताबिक़ 42 प्रतिशत बच्चों को दो या दो से अधिक घरों में रखा गया है। इसके अलावा अगर राज्य के आकंड़ों को देखें तो कर्नाटक में 52 प्रतिशत तो दिल्ली में 67% बच्चों ने अपना बचपन एक से अधिक बाल संस्थानों में गुज़ारा है। कई बच्चों को तो सात अलग-अलग संस्थानों में रखा गया था। इन आंकड़ों की जानकारी से ये साफ़ है कि ऐसे हालात में बच्चे की मानसिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ना लाज़मी है।जुवेनाइल जस्टिस एक्ट2015 की बात करें तो इसके तहत बाल सुधार गृहों में आफ़्टरकेयर का कॉन्सेफ्ट लाया गया। जिससे इन बच्चों को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके। इसके तहत यहां से निकले बच्चे, जिन्होंने 18 वर्ष की उम्र तो पार कर ली है लेकिन 21 वर्ष से कम आयु के हैं, उनके लिए सहायता का प्रावधान किया गया है। क़ानून के अंतर्गत यदि ऐसे बच्चों को किसी भी प्रकार की मदद की आवश्यकता होती है तो ये संस्थान उसे उपलब्ध करवाएंगे। कई साल बीत गए लेकिन क़ानून केवल काग़ज़ों पर ही बना रहा, हक़ीक़त अभी भी इससे कोसों दूर ही नज़र आती है।आखिर ऐसे कैसे हमारे देश का भविष्य आगे बढ़ेगा बड़ा सवाल है?

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